Supreme Court ने AI के न्यायिक इस्तेमाल पर जताई चिंता, नकली कानूनी उदाहरणों पर फोकस
JSRnews.com | National | 02 Jul 2026
परिचय
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग को लेकर हाल ही में अहम निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि AI द्वारा बिना सत्यापन के तैयार की गई सामग्री न्यायिक विश्वास और निष्पक्षता के लिए गंभीर खतरा हो सकती है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक फैसलों की अंतिम जिम्मेदारी हमेशा मानव न्यायाधीशों की होगी और AI केवल सहायक उपकरण के रूप में ही कार्य कर सकता है।
मुख्य उपलब्धियाँ
- राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) द्वारा जारी आदेश में काल्पनिक कानूनी संदर्भ पाए गए।
- सुप्रीम कोर्ट ने AI से उत्पन्न गलत जानकारी की तुलना मिथाइल आइसोसाइनेट गैस रिसाव जैसी गंभीर त्रुटि से की।
- अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया।
- AI का उपयोग सहायक के रूप में माना गया लेकिन अंतिम निर्णय मानव न्यायाधीशों का अनिवार्य।
पृष्ठभूमि
यह टिप्पणी एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड के दिवालियापन मामले की सुनवाई के दौरान आई है। विवादास्पद आदेश में Jammu and Kashmir Bank Limited के बकायादार के रूप में लगभग ₹87.43 करोड़ की राशि को मान्यता देते हुए दिवालापन प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दी गई थी, जिसे निलंबित निदेशक पूजा रमेश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई में यह खुलासा हुआ कि NCLT के आदेश में इस्तेमाल किए गए कुछ कानूनी उदाहरण असल में मौजूद नहीं थे और यह AI टूल की सहायता से तैयार किए गए काल्पनिक संदर्भ प्रतीत हुए।
नई जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि AI का उपयोग बढ़ते न्यायिक कार्यभार को कम करने में उपयोगी साबित हो सकता है, लेकिन तकनीक पर पूरी तरह निर्भर रहना न्यायिक प्रणाली के लिए खतरा होगा। अदालत ने चेतावनी दी कि AI आधारित गलत सूचनाएं, जो शुरुआत में स्पष्ट नहीं होतीं, बाद में पूरे कोर्ट के निर्णय की असली नींव को कमज़ोर कर सकती हैं। इसलिए हर फैसले पर मानवीय नजर और समीक्षा अनिवार्य है।
आधिकारिक बयान
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा, "AI से तैयार किए गए मनगढ़ंत कानूनी उदाहरण न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को नुक़सान पहुंचा सकते हैं। इसलिए अंतिम निर्णय सदैव मानव न्यायाधीशों के नियंत्रण में होना चाहिए।" अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वे AI के कानूनी क्षेत्र में उपयोग और जोखिमों के बारे में एक विशेषज्ञ समिति बनाएं, जो उचित दिशा-निर्देश तय करेगी।
जनता पर प्रभाव
यह निर्णय न्यायिक प्रणालियों में AI के योगदान को लेकर जनता में जागरूकता बढ़ाएगा और कानूनी पेशेवरों के लिए AI का सही उपयोग सुनिश्चित करेगा। इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता और न्यायसंगत प्रक्रिया को भी मजबूती मिलेगी।
आगे क्या होगा?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा गठित समिति AI के सकारात्मक उपयोग और जोखिमों का अध्ययन कर दिशा-निर्देश प्रस्तुत करेगी। सुप्रीम कोर्ट की दिशानिर्देशों के बाद न्यायिक संस्थान AI तकनीक को सीमित और नियंत्रित रूप में अपनाएंगे ताकि न्याय की विश्वसनीयता बनी रहे।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने AI के न्यायिक प्रक्रियाओं में उपयोग को स्वीकार किया है लेकिन स्पष्ट किया कि अंतिम फैसले की जिम्मेदारी मानव न्यायाधीशों की होगी। नकली कानूनी उदाहरणों के खतरे को लेकर सावधानी बरतते हुए, अदालत ने न्याय की शुचिता और विश्वसनीयता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
- प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट ने AI के उपयोग पर क्या कहा?
उत्तर: AI का उपयोग सहायक उपकरण के रूप में स्वीकार किया लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा मानव न्यायाधीश का होगा। - प्रश्न: NCLT के आदेश में क्या समस्या पाई गई?
उत्तर: निदेशक पूजा रमेश सिंह के मामले में AI से बने काल्पनिक कानूनी उदाहरण पाए गए। - प्रश्न: बार काउंसिल को क्या निर्देश मिला?
उत्तर: AI के कानूनी उपयोग पर दिशानिर्देश तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने को कहा गया। - प्रश्न: AI की गलत सूचनाओं का खतरा क्या है?
उत्तर: ये शुरुआत में स्पष्ट नहीं होतीं लेकिन निर्णय की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती हैं। - प्रश्न: यह फैसला कानूनी पेशेवरों के लिए क्या मायने रखता है?
उत्तर: AI का सही और नियंत्रित उपयोग कर न्यायिक कार्यभार कम करने का मौका मिलेगा लेकिन सतर्कता जरूरी होगी।



