सरायकेला-खरसावां में नाबार्ड और टाटा स्टील की ‘वादी परियोजना’ से कृषि क्रांति
JSRnews.com | Local | 17 Jun 2026
परिचय
झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति उभर कर सामने आई है। नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘वादी परियोजना’ ने वहां की बंजर जमीनों को उपजाऊ बनाया है, जिससे आदिवासी किसान आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं। इस पहल ने गांवों की सामाजिक और आर्थिक संरचना में बदलाव लाया है।
प्रमुख झलकियाँ
- पाली हुई बंजर जमीनों को हरे भरे खेतों में बदला गया।
- सामूहिक खेती और बागवानी से किसान आत्मनिर्भर बने।
- 388 परिवार 379 एकड़ भूमि पर योजना से लाभान्वित हो रहे हैं।
- 250 किसानों ने फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की स्थापना कर बिचौलियों से मुक्ति पाई।
- आम और अमरूद की पैदावार से आय में ठोस वृद्धि हुई।
पीछे का परिदृश्य
सरायकेला-खरसावां के कई गांवों की जमीनों को पहले बंजर और अनुपजाऊ माना जाता था। स्थानीय किसानों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर रही, जिससे उनके परिवार की शिक्षा और जीवन स्तर पर संकट बना रहता था। इन समस्याओं के समाधान के लिए नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन ने मिलकर ‘वादी परियोजना’ शुरू की, जिसका लक्ष्य न केवल जमीन की उर्वरता बढ़ाना बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण भी था।
हालिया अपडेट्स
इस परियोजना के तहत रांगामाटिया गांव के सोनाराम सोरेन जैसे किसानों को प्रशिक्षित कर उनकी जमीनों पर सामूहिक खेती को बढ़ावा दिया गया। आम्रपाली और मल्लिका किस्म के आम और एल-49 किस्म के अमरूद के पेड़ लगाकर स्थायी आय के स्रोत विकसित किए गए। इसके साथ ही सब्जियों की मिश्रित खेती से आय बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
कृषि क्रांति की विस्तारित सफलता
आज इस योजना का लाभ 36 गांवों के 388 परिवार उठा रहे हैं, जिन्होंने करीब 379 एकड़ भूमि में 25,000 से अधिक आम और 10,000 अमरूद के पौधे लगाए हैं। इसने क्षेत्र में फल उत्पादन को पांच लाख किलोग्राम तक पहुंचाया है, जिससे किसानों की आमदनी में भारी सुधार हुआ है।
अधिकृत बयान
नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने बताया कि ‘वादी परियोजना’ केवल कृषि सुधार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह किसानों की उम्मीदों का प्रतीक है। फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाकर किसानों को मंडियों तक सीधे उत्पाद पहुँचाने का तरीका अपनाया गया जिससे बिचौलियों का दबाव कम हुआ है।
जनता पर प्रभाव
इस पहल से किसानों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है। खाद्य सुरक्षा बढ़ी है और बच्चों की शिक्षा में निवेश बढ़ा है। समुदाय में आत्मबल और सामाजिक समरसता को खासा बल मिला है। आर्थिक स्थिरता के कारण ग्रामीण पलायन में कमी आई है।
आगे क्या होगा?
‘वादी परियोजना’ के सफल मॉडल को जिले के अन्य हिस्सों तक विस्तार करने की योजना है। साथ ही किसान उत्पाद की गुणवत्ता और विपणन के लिए नई तकनीकों को भी शामिल करने की तैयारी चल रही है। इससे क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता और कृषि पर निर्भरता बनी रहेगी।
निष्कर्ष
सरायकेला-खरसावां में नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘वादी परियोजना’ ने बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर किसानों की आर्थिक दशा बदल दी है। सामूहिक प्रयास और नवोन्मेषी खेती मॉडल से किसान आत्मनिर्भर बनकर सामाजिक बदलाव की मिसाल बने हैं।
पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
- ‘वादी परियोजना’ क्या है?
यह नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन की संयुक्त पहल है, जिसका उद्देश्य बंजर भूमि को उर्वर करना और किसानों की आय बढ़ाना है। - परियोजना का सबसे बड़ा लाभ किसे मिला?
रांगामाटिया गांव के किसान सोनाराम सोरेन इस परियोजना के प्रमुख लाभार्थी हैं जिन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी। - कितने गांवों में परियोजना का प्रभाव है?
यह योजना जिले के 36 गांवों के 388 परिवारों तक फैली हुई है। - किसानों ने अपनी उपज कैसे सीधे मंडी तक पहुंचाई?
250 किसानों ने ‘उआल-बाहा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी’ बनाई है जो उत्पादों को सीधे मंडी तक पहुंचाती है। - मिश्रित खेती का क्या फायदा हुआ?
मिश्रित खेती से किसानों को नियमित आय का स्रोत मिला और खेती का जोखिम कम हुआ।



