चर्च निर्माण और आदिवासी पहचान पर चंपाई सोरेन का सवाल, झारखंड में सियासी बहस तेज
रांची से खबर है कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने राज्य में चर्चों की बढ़ती संख्या और आदिवासी धार्मिक पहचान को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर अपने हालिया पोस्ट में उन्होंने पूछा कि जब आदिवासी समाज प्रकृति पूजक है, तो झारखंड में 5 हजार से अधिक चर्च क्यों बनाए जा रहे हैं। यह बयान राज्य की सियासत में डीलिस्टिंग और आदिवासी पहचान जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को फिर से चर्चा में ला दिया है।
JSRnews.com | Politics | 28 May 2026
चंपाई सोरेन ने अपने बयान में यह भी सवाल किया कि क्या इन चर्चों में आदिवासी देवताओं जैसे मरांग बुरु और सिंगबोंगा की पूजा होती है या नहीं। उनके इस बयान के बाद झारखंड में आदिवासी पहचान, धार्मिक आस्था और डीलिस्टिंग के मुद्दों पर बहस तूल पकड़ गई है।
डीलिस्टिंग और धार्मिक पहचान पर जारी विवाद
चंपाई सोरेन लंबे समय से आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान और डीलिस्टिंग के सवाल को जनहित में उठाते रहे हैं। उन्होंने "जागो आदिवासी, जागो झारखंडी" नामक अभियान भी चलाया था, जिसमें आदिवासी संस्कृति और पहचान के संरक्षण को मुख्य मुद्दा बताया गया था। उनके ताजा बयान के बाद झारखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच बयानबाजी तेज हो गई है।
भाजपा की ओर से दावा किया जा रहा है कि सरना आस्था और सनातन परंपरा दोनों एक सांस्कृतिक धारा हैं जबकि कांग्रेस का कहना है कि सरना आस्था और सनातन धर्म अलग-अलग धार्मिक पहचान हैं। यह बयानबाजी झारखंड में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की राजनीतिक लड़ाई को और बढ़ावा दे रही है।
आदिवासी राजनीति पर प्रभाव और भविष्य के संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चंपाई सोरेन द्वारा उठाए गए आदिवासी अस्मिता, धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसे मुद्दे आने वाले समय में झारखंड की राजनीति को और अधिक गर्माएंगे। आदिवासी समुदाय के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर चल रही यह बहस राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ा सकती है।
इस राजनीतिक सवाल ने झारखंड की सामाजिक संरचना और राजनीति को नई दिशा देने का संकेत दिया है, जहां आदिवासी पहचान का मुद्दा और अधिक तीव्रता से उभर सकता है। इस पूरे प्रकरण पर नजर बनाए रखना भविष्य में झारखंड की राजनीति और सामाजिक गतिवधियों को समझने के लिए आवश्यक होगा।


